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छत्तीसगढ़ यूथ इनोवेशन कॉन्क्लेव में दिखी युवा स्टार्टअप की ताकत, देसी मछली से लेकर रोबोट तक

रायपुर के इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय में इन दिनों छत्तीसगढ़ यूथ इनोवेशन एंड एंत्रप्रेन्योरशिप कॉन्क्लेव का आयोजन किया जा रहा है। इस कॉन्क्लेव में प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों से युवा अपने स्टार्टअप और नए बिजनेस आइडिया लेकर पहुंचे हैं। किसी ने 5 हजार रुपए की नौकरी से शुरुआत की, तो कोई पढ़ाई के साथ कारोबार खड़ा कर रहा है। कोई देसी मछलियों को बाजार तक पहुंचा रहा है, तो कोई रोबोट से बीज बोने की तैयारी कर रहा है। छत्तीसगढ़ यूथ इनोवेशन एंड एंत्रप्रेन्योरशिप कॉन्क्लेव में पहुंचे ऐसे ही स्टार्टअप्स की ये कहानियां हैं।

पढ़ाई के साथ शुरू किया कारोबार, देसी मछलियों से 50 लाख का टर्नओवर: ऐसे ही स्टार्टअप्स में एक कहानी आईजीकेवी के फाइनल ईयर के स्टूडेंट तन्मय वर्मा की है। पढ़ाई के साथ काम शुरू किया और अब देसी मछलियों के कारोबार से सालाना करीब 50 लाख रुपए का टर्नओवर कर रहे हैं। तन्मय कृषि विश्वविद्यालय के एजीएम डिपार्टमेंट में पढ़ाई कर रहे हैं। पढ़ाई पूरी होने का इंतजार करने के बजाय उन्होंने पढ़ाई के दौरान ही अपना काम शुरू कर दिया। उनका स्टार्टअप छत्तीसगढ़ की देसी मछलियों से जुड़ा है। किसान मछली तैयार करते हैं, तन्मय उनसे मछली खरीदते हैं और फिर उसे सीधे बाजार में बेचने वालों तक पहुंचाते हैं। यानी किसान और बाजार के बीच की दूरी कम करने का काम तन्मय कर रहे हैं। वे बताते हैं कि उन्होंने इस काम की शुरुआत पढ़ाई के साथ ही कर दी थी। शुरुआत में छोटे स्तर पर काम किया, लेकिन धीरे-धीरे उन्हें इसमें कारोबारी संभावना नजर आई। इसके बाद साल 2024 में उन्होंने अपनी कंपनी रजिस्टर्ड कराई और कंसल्टिंग फार्मिंग के साथ इस काम को आगे बढ़ाया। उनका काम सिर्फ मछली पालन तक सीमित नहीं है। वे किसानों से मछलियां खरीदकर उन्हें सीधे स्ट्रीट फिश वेंडर्स तक पहुंचाते हैं। इस तरह किसानों से लेकर बाजार तक मछली पहुंचाने की एक सीधी सप्लाई चेन तैयार की गई है।

देसी मछलियों पर फोकस: तन्मय का कहना है कि उनके काम का सबसे बड़ा फोकस छत्तीसगढ़ की देसी मछली प्रजातियां हैं। उनका उद्देश्य इन मछलियों को बाजार उपलब्ध कराना और इन्हें पालने वाले किसानों को बेहतर दाम दिलाना है। वे देसी बाम्बी, सिंघी, केवई, तलपिया, गिनवा, भुंडा और चितल जैसी मछलियों को किसानों से खरीदकर बाजार तक पहुंचा रहे हैं। उनका मानना है कि स्थानीय स्तर पर उपलब्ध इन मछलियों की मांग को व्यवस्थित तरीके से बाजार से जोड़ा जाए तो किसानों के लिए कमाई का एक बेहतर जरिया तैयार हो सकता है।

सालाना टर्नओवर करीब 50 लाख रुपए: इस काम में तन्मय अकेले नहीं हैं। उनके साथ उनके कुछ क्लासमेट भी जुड़े हुए हैं। खास बात यह है कि यह पूरा काम उनकी पढ़ाई के साथ चल रहा है। यानी एक तरफ वे कृषि विश्वविद्यालय में फाइनल ईयर की पढ़ाई कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ अपने स्टार्टअप को भी आगे बढ़ा रहे हैं। तन्मय के मुताबिक, किसानों से मछलियां खरीदकर उन्हें बाजार तक पहुंचाने के इसी मॉडल से उनका सालाना टर्नओवर करीब 50 लाख रुपए तक पहुंच गया है।

5 हजार की नौकरी से 25 लाख का कारोबार, बनाई सस्ती इनक्यूबेटर मशीन: तन्मय ने पढ़ाई के साथ कारोबार शुरू किया, लेकिन मनमोहन यादव की कहानी एक छोटी नौकरी से शुरू होती है। जिन्होंने छोटे स्तर से शुरुआत कर अपना कारोबार खड़ा किया। इनकी कहानियां इसलिए खास हैं, क्योंकि इनके पीछे बड़े निवेश से ज्यादा अपनी जरूरत, सीखने की कोशिश और कुछ नया करने का जज्बा रहा है। ऐसी ही कहानी है कोरबा के किसान मनमोहन यादव की। कभी कृषि विज्ञान केंद्र में मजदूरी करने वाले मनमोहन को महीने में सिर्फ 5 हजार रुपए मिलते थे। लेकिन इसी नौकरी ने उन्हें कुछ ऐसा सीखने का मौका दिया, जिसे उन्होंने बाद में अपने कारोबार की नींव बना लिया।

कृषि विज्ञान केंद्र में मजदूरी से शुरू हुआ सफर: मनमोहन कृषि विज्ञान केंद्र, कोरबा में लेबर के तौर पर काम करते थे। इसी दौरान उनकी मुलाकात वहां के प्रोफेसर शिव कुमार महोबिया से हुई। मनमोहन ने उनके संपर्क में रहते हुए अंडों से चूजे निकालने की प्रक्रिया को समझा और इसी से उनके मन में खुद की इनक्यूबेटर मशीन बनाने का आइडिया आया। इसके बाद उन्होंने प्रयोग शुरू किए। कोशिश थी कि ऐसी मशीन बनाई जाए, जिसे किसान आसानी से खरीद सकें और उसके लिए बड़ी रकम खर्च न करनी पड़े।

3500 रुपए में 50-60 अंडों से चूजे वाली मशीन: मनमोहन ने ऐसी स्वचलित इनक्यूबेटर मशीन तैयार की, मशीन में अंडे रखने के बाद तापमान और दूसरी जरूरी प्रक्रिया अपने आप नियंत्रित होती है और तय समय के बाद उनसे चूजे निकलते हैं, जिसमें एक बार में 50 से 60 अंडे रखकर चूजे निकाले जा सकते हैं। खास बात इसकी कीमत है। इस क्षमता वाली मशीन की कीमत करीब 3500 रुपए रखी गई है। धीरे-धीरे उन्होंने मशीन की क्षमता बढ़ाने पर भी काम किया। अब मनमोहन 15 हजार अंडों की क्षमता वाली इनक्यूबेटर मशीन भी तैयार कर चुके हैं।

खुद के साथ दूसरे किसानों को भी रोजगार: मनमोहन का काम बढ़ा तो उन्होंने सिर्फ अपने लिए कमाई का जरिया नहीं बनाया, बल्कि दूसरे किसानों को भी अपने स्टार्टअप से जोड़ा। उनके यहां कुछ किसान काम कर रहे हैं और सभी को मिलाकर वे हर महीने करीब 50 से 60 हजार रुपए वेतन देते हैं। यानी जिस मनमोहन की अपनी शुरुआत महज 5 हजार रुपए महीने की मजदूरी से हुई थी, आज वही अपने कारोबार में दूसरे लोगों को रोजगार देने की स्थिति में हैं।

22 राज्यों तक पहुंचा कारोबार: मनमोहन की बनाई इनक्यूबेटर मशीन अब सिर्फ छत्तीसगढ़ तक सीमित नहीं है। वे बताते हैं कि उनका प्रोडक्ट देश के 22 राज्यों तक पहुंच चुका है। पिछले साल उनके स्टार्टअप का टर्नओवर करीब 24 से 25 लाख रुपए रहा। यानी कृषि विज्ञान केंद्र में 5 हजार रुपए की नौकरी से शुरू हुआ मनमोहन का सफर अब लाखों के कारोबार तक पहुंच चुका है। मनमोहन की कहानी की खास बात यही है कि उन्होंने किसी बड़े कारोबार से शुरुआत नहीं की। कृषि विज्ञान केंद्र में काम करते हुए जो सीखा, उसी को अपने प्रयोग से आगे बढ़ाया और किसानों की जरूरत को समझते हुए एक ऐसी मशीन तैयार की, जिसे अब देश के अलग-अलग राज्यों में इस्तेमाल किया जा रहा है।

अमन का छोटा रोबोट किसानों के लिए करेगा बीजों की रोपाई: जहां मनमोहन ने किसानों के काम आने वाली मशीन बनाई, वहीं अंबिकापुर के अमन खेती में रोबोट का इस्तेमाल करने की तैयारी कर रहे हैं। अंबिकापुर के वाड्राफनगर के रहने वाले अमन मिश्रा अभी एमबीए की पढ़ाई कर रहे हैं। पढ़ाई के साथ अमन की दिलचस्पी खेती में इस्तेमाल होने वाली तकनीक को आसान बनाने में है। इसी सोच के साथ उन्होंने एक ऐसे छोटे रोबोट पर काम शुरू किया है, जो किसानों के लिए बीजों की रोपाई का काम अपने आप कर सके। अमन जिस तकनीक को विकसित कर रहे हैं, वह एक ऑटोमेटिक सीड प्लांटर रोबोट है। अमन अभी इस रोबोट का प्रोटोटाइप तैयार कर रहे हैं। इसका इस्तेमाल खास तौर पर बड़े किसानों और बड़े स्तर के प्लांटेशन में किया जा सकेगा। मशीन में बीज डाले जाएंगे। इसके बाद रोबोट खुद जमीन में जगह बनाएगा और उसमें बीज डालता जाएगा। साथ ही किस जगह कौन-सा बीज लगाया गया, इसका रिकॉर्ड भी डिजिटल तरीके से रखा जा सकेगा। इसके साथ ही इसकी ऑनलाइन मॉनिटरिंग भी की जा सकेगी। यानी किसान यह जानकारी रख सकेंगे कि किस जगह कौन-सा बीज लगाया गया और उसकी पूरी प्रक्रिया को ऑनलाइन ट्रैक किया जा सके। तकनीक को आगे विकसित करने और बड़े स्तर पर तैयार करने के लिए उन्हें फंडिंग की जरूरत है, इसी तलाश में वे कॉन्क्लेव पहुंचे हैं। एक एमबीए स्टूडेंट के आइडिया से शुरू हुई यह कोशिश अब ऐसे रोबोट का रूप ले रही है, जो आने वाले समय में बड़े पैमाने पर होने वाली खेती और प्लांटेशन में बीजों की रोपाई का काम आसान कर सकता है।

15 साल कॉरपोरेट नौकरी के बाद बनाया कृषि मित्र ऐप: कोरबा के सौरभ सराफ ने अपने करियर के करीब 15 साल कॉरपोरेट सेक्टर में नौकरी करते हुए बिताए। 2011 में रायपुर एनआईटी से इलेक्ट्रॉनिक्स की पढ़ाई पूरी करने के बाद सौरभ सराफ ने करीब 15 साल कॉरपोरेट सेक्टर में नौकरी की। अब उन्होंने अपना अनुभव खेती से जोड़ते हुए किसानों के लिए ‘कृषि मित्र’ ऐप तैयार किया है। उनका मकसद किसानों को खेती से जुड़ी जरूरी जानकारी और विशेषज्ञों की सलाह एक ही जगह उपलब्ध कराना है। किसान इस प्लेटफॉर्म के जरिए एग्रीकल्चर के किसी भी सेक्टर सी जुड़ी जानकारी ले सकेंगे और एक्सपर्ट से सलाह भी प्राप्त कर सकेंगे। सौरभ का आइडिया सिर्फ एक ऐप तक सीमित नहीं है। वे कृषि के लिए एक ऐसी डिजिटल लेयर तैयार करना चाहते हैं, जहां किसान को अलग-अलग जरूरतों के लिए अलग-अलग जगह भटकना न पड़े। उनका प्रयास है कि एग्रीकल्चर, हॉर्टिकल्चर, पोल्ट्री और फिशरीज जैसे अलग-अलग क्षेत्रों के विशेषज्ञ एक ही प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध हों। किसान जहां रहता है, वहां के आसपास का विशेषज्ञ भी उसे इस प्लेटफॉर्म के जरिए मिल सके। जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ ऑनलाइन सलाह दे और जरूरत होने पर सीधे किसान के खेत तक पहुंचकर भी मदद कर सके।

किसानों और विशेषज्ञों के बीच की दूरी कम करना मकसद: यानी सौरभ का आइडिया एक ऐसे डिजिटल प्लेटफॉर्म का है, जहां किसान को सिर्फ जानकारी ही नहीं, बल्कि अपनी जरूरत के हिसाब से विशेषज्ञ भी मिल सके। कॉरपोरेट सेक्टर में 15 साल काम करने के बाद सौरभ अब अपनी तकनीकी समझ को खेती से जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। उनका कहना है कि कृषि मित्र के जरिए वे किसानों और विशेषज्ञों के बीच की दूरी कम करना चाहते हैं। इसी आइडिया को आगे बढ़ाने और अपने स्टार्टअप के लिए नए अवसर तलाशने के लिए सौरभ रायपुर में आयोजित छत्तीसगढ़ यूथ इनोवेशन एंड एंत्रप्रेन्योरशिप कॉन्क्लेव में पहुंचे हैं।

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