
छत्तीसगढ़ में बालिका तस्करी और सौदेबाजी से जुड़ी भास्कर की पड़ताल में सामने आया है कि अंबिकापुर के मैनपाट ब्लॉक में मांझी जनजाति के परिवार अपनी नाबालिग बेटियों को बंधुआ के रूप में लोगों को सौंप रहे हैं। 12 से 15 साल की बेटियों के लिए माता-पिता खुद 3 हजार से 12 हजार रुपए महीने की कीमत तय कर रहे हैं। खरीदार गांव पहुंचकर बेटी को देखते हैं, काम की बात करते हैं और सौदा करते हैं। न खरीदार का नाम-पता पूछा जाता है, न दस्तावेज लिया जाता है। पूरा लेनदेन जुबानी होता है।
दैनिक भास्कर की 10 दिन की पड़ताल में मैनपाट के पांच गांवों में नाबालिग बच्चियों को काम के लिए दूसरे शहरों में भेजे जाने के कई मामले सामने आए। पड़ताल के दौरान भास्कर रिपोर्टर ने खुद को रायपुर का कारोबारी बताकर घरेलू काम के लिए एक लड़की की जरूरत बताई। एक परिवार ने 14 साल की बेटी दिखाई। मां ने 5 हजार रुपए महीने मांगे, पिता 12 हजार रुपए पर अड़ा रहा। आखिरकार 10 हजार रुपए महीने में सौदा तय हो गया। भास्कर ने बच्ची को ले जाने की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ाई, क्योंकि नाबालिग को इस तरह काम के लिए सौंपना कानूनन अपराध है।
पड़ताल में सामने आया कि इन गांवों से 40 से अधिक बच्चियों को घरेलू और दूसरे कामों के लिए अंबिकापुर, सीतापुर और रायपुर सहित अन्य शहरों में भेजा गया है। कुछ मामलों में बच्चियों के साथ दुर्व्यवहार और मारपीट की शिकायतें भी सामने आईं। मांझी जनजाति के गांवों की संख्या 40 से अधिक है, इसलिए प्रभावित बच्चियां इससे ज्यादा होने की आशंका है। स्थानीय लोगों ने बताया कि गांव के जनप्रतिनिधियों को भी बच्चियों को इस तरह बंधुआ बनाकर भेजे जाने की जानकारी है।
बंदना, उड़मकेला, कोट, जजगा और जमड़ी गांवों की पड़ताल में नाबालिगों को काम के लिए बाहर भेजने के साथ बच्चों को तस्करी के जरिए ले जाने की जानकारी भी मिली। स्थानीय लोगों के मुताबिक, पांच बच्चों को बाहर ले जाया गया था। इनमें से तीन रेस्क्यू किए जा चुके हैं, जबकि दो अब भी लापता हैं।
मैनपाट के तराई क्षेत्र से नाबालिग बच्चियों को काम के लिए बाहर भेजे जाने की सूचना मिलने के बाद भास्कर ने करीब दो महीने तक इस इलाके की जानकारी जुटाई। क्षेत्र में मांझी जनजाति के 50 से ज्यादा गांव बताए जाते हैं। इन परिवारों की आजीविका पशुपालन, सीमित खेती और मजदूरी पर निर्भर है। बाल अधिकार और आप (CRY) से अनुबंधित पथप्रदर्शक सरगुजा के बाल तस्करी रोकथाम प्रोजेक्ट की जानकारी मिलने के बाद टीम ने गांवों का दौरा किया। पांच गांवों में परिवारों से बातचीत की गई। इसी दौरान बच्चियों को काम के लिए बाहर भेजने और रकम तय करने के मामले सामने आए।
परिवारों के मुताबिक बच्चियों को दूसरे लोगों के साथ भेजने की वजह शिक्षा का अभाव, आर्थिक तंगहाली और शराबखोरी में पैसों की बर्बादी है। पड़ताल में सामने आया कि बेटियों को दिखाकर उनकी बोली लगाई जाती है।
पहला मामला: लक्ष्मी (बदला हुआ नाम), उम्र 14 साल 9 महीने, ग्राम कोट, मैनपाट। 24 सितंबर, दोपहर 12:30 बजे कोट गांव में फूलकुंवर और उसके पति संसलाल से मुलाकात हुई। बातचीत में दोनों ने अपनी बेटी को बुलाकर सामने खड़ा कर दिया। रिकॉर्डेड बातचीत के अंश के मुताबिक घरेलू काम के लिए लड़की चाहिए, यह पूछने पर फूलकुंवर ने कहा कि उसकी बेटी भी पहले रायपुर काम करने गई थी। फूलकुंवर ने बेटी से कहा कि रायपुर जाना है। संसलाल ने कहा कि बेटी को गायब कर दिया तो कहां खोजकर लाऊंगा, वह बिलासपुर तक गई है, रायपुर नहीं। फूलकुंवर ने कहा कि इसे अपने कब्जे में रखना, मैं फोन पर बात करूंगी, गलत-सलत किया तो तुम पर केस कर दूंगी, वैसे भी यहां कुछ काम-धाम तो ये नहीं करती। पैसा पूछने पर संसलाल ने 10 हजार रुपए महीने से कम नहीं कहा, जबकि फूलकुंवर ने 5 हजार रुपए महीने देने की बात कही। 12 हजार रुपए देने की बात पर बातचीत के बाद 10 हजार रुपए महीने में सौदा तय हो गया। भास्कर ने नाबालिग को ले जाने की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ाई। इसके बाद लक्ष्मी ने पूछा कि उसे क्या काम करना होगा, तो बताया गया कि दो साल के बच्चे की देखभाल और बर्तन-भांडे करने होंगे। लक्ष्मी ने तीन दिन बाद जाने की बात कही। परिवार के मुताबिक, वह पहले भी सीतापुर और रायपुर में करीब दो साल काम कर चुकी है।
दूसरा मामला: गीता मांझी (बदला हुआ नाम), जन्मतिथि 6 मई 2011 और सीता मांझी (बदला नाम), जन्मतिथि 1 जनवरी 2012, ग्राम दोरापारा, कोट, मैनपाट। फुलेश्वरी ने आर्थिक तंगी के चलते दोनों नाबालिग बेटियों को काम के लिए भेज दिया। उसके मुताबिक, दोनों 4 महीने पहले गई थीं, पर वह नहीं जानती कि वे किसके साथ और कहां हैं। एक बेटी को दूर के रिश्तेदार के जरिए भेजा गया। दूसरी को लेने दो लोग बाइक से गांव पहुंचे थे। फुलेश्वरी के मुताबिक, दोनों को बच्चों की देखभाल का काम मिला है। रकम कितनी तय हुई, इसकी उसे जानकारी नहीं है। दोनों से अब तक संपर्क भी नहीं हुआ है।
तीसरा मामला: बुलबुल मांझी (बदला हुआ नाम), उम्र 14 साल, ग्राम कोट, मैनपाट। पिलसाय मांझी ने बताया कि बेटी को 3 हजार रुपए महीने देने की बात कहकर अंबिकापुर ले जाया गया था। गाली-गलौज हुई तो वह डरकर गांव लौट आई। बातचीत में बुलबुल सहमी हुई थी। पिलसाय ने कहा कि अब मैं उसे काम के लिए नहीं भेजूंगा।
बाल अधिकार और आप (CRY) सरगुजा के कोऑर्डिनेटर अनिल कुमार के मुताबिक जबरन काम के लिए भेजना बाल तस्करी में शामिल है। बीएनएस, 2023 की धारा 143 में बाल तस्करी से जुड़े प्रावधान हैं। शोषण के उद्देश्य से बल, दबाव, अपहरण, धोखे से ले जाना तस्करी की श्रेणी में आ सकता है। इसमें जबरन सेवा, शोषण और भिक्षावृत्ति शामिल हैं। छत्तीसगढ़ बाल संरक्षण आयोग की अध्यक्ष डॉ. वर्णिका शर्मा ने कहा कि गांवों की सूची दीजिए, मैं तत्काल टीम भेजकर जांच करवाऊंगी और आवश्यक कार्रवाई करूंगी। मैं गांव-गांव में बाल चौपाल लगा रही हूं। मुझे भी इस तरह के इनपुट मिले हैं।



