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पंचायतों में 4 करोड़ 9 लाख का गबन, अब तक महज 95.29 लाख की वसूली

बिलासपुर जिले की मस्तूरी, बिल्हा, कोटा और तखतपुर तहसील की ग्राम पंचायतों में सरकारी खजाने पर बड़े पैमाने पर डाका पड़ा है। शासकीय फाइलों के पन्ने पलटने पर सामने आया है कि जिन हाथों में गांव के बच्चों का भविष्य संवारने (सर्व शिक्षा अभियान), मजदूरों को रोजगार देने (मनरेगा, रोजगार गारंटी) और गरीबों के सिर पर छत या आंगनबाड़ी भवन बनाने की जिम्मेदारी थी, उन्हीं हाथों ने सरकारी राशि का गबन किया, जिससे विकास वर्षों पीछे छूट गया।

मस्तूरी एसडीएम न्यायालय की हालिया रिपोर्ट कार्यालय अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) मस्तूरी द्वारा उपसंचालक पंचायत को भेजी गई हालिया मासिक रिपोर्ट (जून 2026) ने वसूली के दावों की हवा निकाल दी है। न्यायालय अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) मस्तूरी के अंतर्गत कुल 12 प्रकरणों में 38,59,400 रुपये की गफलत थी। इसमें से अब तक केवल एक प्रकरण में 11,68,600 रुपये की राशि वसूल हो पाई है, जबकि 11 प्रकरणों में 26,90,800 रुपये की बकाया वसूली अब भी अधर में लटकी हुई है।

ग्राम कुकुर्दीकेरा में तत्कालीन सरपंच महेंद्र कुमार सेन, तत्कालीन सचिव विक्की आनंद व वर्तमान सचिव रामबाबू गेंदले पर 14,06,900 रुपये की सबसे बड़ी बकाया राशि दर्ज है। ग्राम झलमला में तत्कालीन सरपंच राजेन्द्र साहू व तत्कालीन सचिव जयनारायण पाटनवार पर सी.सी. रोड निर्माण कार्य (कड़छा के घर से जनकराम के घर तक) के नाम पर 3,48,500 रुपये एवं अन्य निर्माण कार्यों में 1,48,000 रुपये की रिकवरी पेंडिंग है।

ग्राम मटिया में तत्कालीन सरपंच प्रमिला प्रजापति व सचिव देवप्रसाद पर नाली निर्माण कार्य हेतु 2,50,000 रुपये तथा 1,50,000 रुपये के गबन का मामला है। ग्राम कर्रा में तत्कालीन सरपंच ललिता ध्रुव व तत्कालीन सचिव लक्ष्मेश्वरी साहू पर प्राथमिक शाला में रंगमंच निर्माण एवं अन्य कार्यों के 75,000-75,000 रुपये के दो अलग-अलग प्रकरण दर्ज हैं।

ग्राम बिनौरी में तत्कालीन सरपंच सुरुज बाई एवं तत्कालीन सचिव प्रेमलाल कंवर पर बोर खनन एवं स्थापना कार्य (सुरेश के घर के पास) कार्य के 75,000 रुपये बकाया है। ग्राम मुड़पार में तत्कालीन सरपंच कृष्णाबाई व तत्कालीन सचिव विवेक सिंह राठौर पर 40,000 रुपये की रिकवरी दर्ज है। ग्राम नरगोड़ा में तत्कालीन प्रभारी सरपंच मनोज भोसले व सचिव टीकाराम चंद्राकर पर 30,000 रुपये की बकाया राशि दर्ज है।

आदेश में कहा गया है कि शेष 26,90,800 रुपये की वसूली हेतु तहसीलदार मस्तूरी, सीपत एवं पचपेड़ी को निर्देश देकर फाइल बंद कर दी गई थी। चारों तहसीलों में कुल मिलाकर 4 करोड़ 9 लाख रुपये से अधिक का सरकारी गबन हुआ। प्रशासन अब तक महज 95.29 लाख रुपये (लगभग 23.2 फीसदी) ही वसूल पाया है, जबकि 3.14 करोड़ रुपये (लगभग 76.8 फीसदी) आज भी भूतपूर्व सरपंचों और सचिवों की जेबों में सलामत हैं।

कोटा जनपद में 80.72 लाख रुपये के गबन के खिलाफ केवल 73,000 रुपये ही जमा कराए जा सके हैं। यानी वसूली दर 1 फीसदी से भी कम रही। कई मामलों में लिखा है, “सरपंच मृत” या “संबंधित द्वारा राशि जमा नहीं की जा रही”। प्रशासन हाथ पर हाथ धरे बैठा रहा और आरोपी बिना पाई चुकाए दुनिया से अलविदा कह गए या गायब हो गए।

दस्तावेजों में दर्ज योजना के नाम बताते हैं कि यह भ्रष्टाचार सिर्फ पैसों का नहीं, बल्कि इंसानियत का भी था। दर्जनों पंचायतों (जैसे मस्तूरी के नरगोडा, कुकुर्दीकेरा, ठरकपुर, बिल्हा के उमरिया) में मासूम बच्चों के स्कूल, किचन शेड और पढ़ाई के पैसे डकार लिए गए। रोजगार गारंटी (मनरेगा) के तहत पसीना बहाने वाले मजदूरों की मजदूरी के नाम पर जारी लाखों रुपये (जोधरा के संजय पटेल का 5.18 लाख रुपये और कछार की बिमला बाई का 5.18 लाख रुपये का मामला) डकार लिए गए।

ग्राम पंचायतों में बुनियादी विकास जैसे सी.सी. रोड, नाली निर्माण, बोर खनन व प्रकाश व्यवस्था का पैसा भी हड़प लिया गया। प्रशासन की लचर तंत्र का नमूना एसडीएम दफ्तरों से जारी पत्रों में स्पष्ट लिखा है कि जनपद पंचायतें वसूली के लिए सहयोग ही नहीं कर रही हैं। एसडीएम कोटा द्वारा सीईओ तखतपुर को सन 2015 में लिखे पत्र में साफ शिकायत दर्ज है कि आरआरसी जारी होने के बावजूद अधिकारी वेतन से कटौती करने या कठोर कार्रवाई करने में नाकाम रहे। कहीं हाई कोर्ट की रिट पिटीशन का बहाना बनाकर फाइलों को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया (जैसे बिल्हा का प्रकरण), तो कहीं आर.आर.सी. जारी न होने की बात कहकर केस ही समाप्त मान लिए गए।

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