बिलासपुर में घरेलू और पारिवारिक जरूरत के लिए लिए गए पांच लाख रुपये का चेक अनादरित होने के मामले में न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी प्रणव वैद्य की अदालत ने महिला मंजूषा मानिकपुरी को दोषी ठहराया है। अदालत ने परक्राम्य लिखत अधिनियम की धारा 138 के तहत उसे एक माह के साधारण कारावास और 10 लाख रुपये क्षतिपूर्ति राशि देने की सजा सुनाई। क्षतिपूर्ति राशि नहीं देने पर दो माह का अतिरिक्त कारावास भुगतना होगा।
यदुनंदन नगर, तिफरा बिलासपुर निवासी रितेश अग्रवाल ने अधिवक्ता जितेंद्र मुदलियार के माध्यम से परिवाद दायर किया था। आरोप के अनुसार साईं विहार, तिफरा निवासी मंजूषा मानिकपुरी ने 12 जुलाई 2019 को पारिवारिक जरूरत और पति के व्यवसाय के लिए पांच लाख रुपये उधार लिए थे।
रकम लौटाने के लिए उसने ओरिएंटल बैंक आफ कामर्स, तिफरा शाखा का पांच लाख रुपये का चेक जारी किया। चेक बैंक में जमा करने पर खाते में पर्याप्त राशि नहीं होने के कारण अनादरित हो गया।
विधिक नोटिस के बावजूद भुगतान नहीं होने पर परिवादी ने अदालत में मामला दायर किया। बचाव पक्ष के अधिवक्ता गोपी जैसवानी ने चेक सुरक्षा के तौर पर दिए जाने की दलील दी।
अदालत ने आरोपित के स्वीकार किए गए इकरारनामे और विधिक नोटिस के जवाब सहित उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर माना कि पांच लाख रुपये का वैध आर्थिक दायित्व मौजूद था।
अदालत ने कहा कि चेक आधारित लेन-देन में भुगतान के साधन के रूप में चेक की विश्वसनीयता बनाए रखना जरूरी है। परिवादी लंबे समय से अपनी रकम से वंचित रहा।
इन परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने चेक राशि की दोगुनी यानी 10 लाख रुपये क्षतिपूर्ति के रूप में देने का आदेश दिया।



