
रायपुर के चौक-चौराहों पर कैंसर पीड़ितों की मदद के लिए दान मांगते लोगों का एक बड़ा ठगी गिरोह सामने आया है। 6 महीने तक चली भास्कर की इन्वेस्टिगेशन में यह सच उजागर हुआ है। मदद मांगने वाले डिब्बों पर ‘सोसायटी फॉर कैंसर एंड रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन’ संस्था का जिक्र है, जिसमें दावा किया गया है कि वह सरकार से मान्यता प्राप्त है।
डिब्बे पर लिखे नंबर पर संपर्क करने पर जावेद नाम के व्यक्ति से बात हुई। उसने खुद को संस्था का अध्यक्ष बताया। जावेद ने स्वीकार किया कि वह दो तरीकों से लोगों को चौराहों पर खड़ा करता है – दिहाड़ी और सैलरी पर। दिहाड़ी के तौर पर 300-400 रुपए रोज दिए जाते हैं, जबकि सैलरी के तौर पर 15 हजार रुपए महीने मिलते हैं। दान में मिलने वाला सारा पैसा जावेद के पास ही जाता है।
यह जानने के लिए कि इन पैसों से लोगों की मदद हो रही है या नहीं, जावेद को एक कैंसर पीड़ित की मेडिकल रिपोर्ट भेजी गई। जावेद ने 10 तरह के कागजात मांगे, जिससे एक सामान्य कैंसर मरीज को देना नामुमकिन है। इसमें पुलिस स्टेशन से पत्र लेकर विधायक तक के आवेदन शामिल हैं। जब सभी कागजात बनवाने की तैयारी की गई तो ऊंची जाति का बहाना बनाकर मदद करने से मना कर दिया। इससे साफ है कि सिर्फ कैंसर के नाम पर सहानुभूति लेकर जनता को लूटा जा रहा है।
संस्था की वेबसाइट scrorg.com को सरकारी तरह से डिजाइन किया गया है। वेबसाइट पर संस्था का रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट लगा है। लेकिन अब तक कितने लोगों को मदद दी गई, इसकी कोई सूची नहीं है। मदद लेने से पहले 10 दस्तावेज देने होंगे, इसका भी जिक्र नहीं है। सिर्फ अकाउंट नंबर और पता लिखा है।
मदद मांगने वाले दिहाड़ी के लोग 7 से अधिक जगहों पर खड़े होते हैं। कलेक्टोरेट, शंकर नगर, पंडरी, जयस्तंभ, तेलीबांधा, डॉ. अंबेडकर अस्पताल और फाफाडीह चौक समेत कई जगहों पर संस्था के डब्बे लेकर लोग खड़े रहते हैं। कलेक्टोरेट के पास भारती और सुरेंद्र पांडे खड़े होते हैं। सुरेंद्र ने बताया कि पत्नी भारती के साथ मैं कई दिनों से संस्था से जुड़ा हूं। मैं खुद भी कैंसर मरीज हूं। दान की राशि में से कुछ मदद मुझे भी मिल जाती है।
शास्त्री चौक पर दो लोग खड़े मिले। वहां खड़े अजय पांडे नामक युवक ने बताया कि वह तीन साल से वालंटियर के तौर पर संस्था में काम कर रहा है। वे रोज 3 से 4 घंटे शाम को यहां खड़े होते हैं, इसके लिए उन्हें संस्था से रोजाना 300 से 400 रुपए मिलते हैं। अजय ने बताया कि हर दिन लगभग 700-800, कभी हजार रुपए से ज्यादा भी मिल जाते हैं। यह राशि हमें दिल्ली हेड ऑफिस भेजनी होती है।
डोनेशन कलेक्ट करने वाले वालंटियर के पास लगी तख्ती पर संस्था के दफ्तर का पता आरजेड-21 बी, अर्जुन पार्क, नजफगढ़, नई दिल्ली लिखा है। भास्कर टीम इस पते पर पहुंची तो वहां करीब 100 गज का तीन मंजिला मकान था। यहां रहने वाले परिवार ने बताया कि संस्था के नाम पर कई लोग पूछने आते हैं। हम परेशान हैं। यहां कोई दफ्तर नहीं है। एक बार तो पुलिस भी पूछताछ करने आ गई थी। पड़ोस के ही मोनू पांडे ने बताया कि यहां ऐसा कोई संस्था नहीं है। हम कई साल से यहां रह रहे हैं, लेकिन कभी कोई संस्था के बारे में सुना तक नहीं है।
संस्था के अध्यक्ष बताने वाले जावेद से बातचीत के अंश: भास्कर: मुझे संस्था से जुड़ना है। जावेद- वॉट्सएप पर आधार कार्ड भेज दिए। उसमें आवेदन कीजिए कि हमें वालंटियर जॉब की जरूरत है। कमेटी के सामने आपकी बात रखी जाएगी। भास्कर: वालंटियर के लिए मुझे नौकरी छोड़नी होगी। जावेद- फुल टाइम और पार्ट टाइम करते हैं। कुछ लोग फ्री में सेवा देते हैं, जब उन्हें समय मिलता है। भास्कर: फुल टाइम का कितना मिलेगा। जावेद- 15000 महीने मिलेगा। भास्कर: हमें चौराहे पर दिनभर डब्बा लेकर खड़ा रहना होगा। जावेद- यह भी कर सकते हैं या फिर पर्ची लेकर घर-घर, स्कूल, बैंक या ऑफिस जाना होता है। हमारे वालंटियर पूरे देश में हैं। भास्कर: हमारा कोई टारगेट तो नहीं रहेगा, कहीं दान कम मिला तो वेतन कम होगा। जावेद- सैलरी में से नहीं काटते हैं, लेकिन काम ऐसे ही लोगों को देते हैं जो पैसा ला सकें। भास्कर: रिपोर्टिंग देनी होती है। जावेद- सप्ताह में एक बार हिसाब किताब करना होता है। मैनेजर आपके पास जाएंगे उन्हें पैसा देना होगा। भास्कर: पार्ट टाइम का कितना देते हैं। जावेद- बेस्ट लोकेशन आपको खोजना होगी। 15 दिन ट्रेनिंग में रहेंगे। उसका कुछ मिलेगा, फिक्स वेतन नहीं रहेगा। आपको हर दिन 2-3 घंटे काम करना होगा। काम देखेंगे तब आगे काम दिया जाएगा।
यह जांचने के लिए कि एनजीओ जरूरतमंद की मदद कर रहा है या नहीं, हमने जावेद से एक बार फिर बात की। भास्कर: मेरे मित्र के पिता को कैंसर है। वे बहुत गरीब हैं, मदद मिलेगी क्या। जावेद- आप उनके दस्तावेज भेजिए। फिर बताते हैं। भास्कर: कौन-कौन से दस्तावेज। जावेद- पासपोर्ट साइज फोटो-4, कैंसर सोसाइटी के नाम आवेदन, जांच रिपोर्ट, प्रिसिकिप्शन, आईडी प्रूफ, आय प्रमाण पत्र, खर्च का प्रमाण, पुलिस स्टेशन से पत्र, विधायक-सांसद का पत्र, एफीडेविट। (हमने एक कैंसर पेशेंट की जांच रिपोर्ट भेजी। उनका नाम सैय्यद से शुरू होता है।) भास्कर: हमने पेशेंट की रिपोर्ट भेजी है। अगर मदद करें तो ये सभी दस्तावेज तैयार करवाएं। जावेद- इन्हें तो मदद नहीं मिल सकती। ये ऊंची जाति के हैं।



