
हाईकोर्ट के जस्टिस पार्थ प्रतीम साहू और जस्टिस सुषमा सावंत की डिवीजन बेंच ने ननद और भाभी के बीच 21 लाख रुपए के लेन-देन के विवाद को वैवाहिक विवाद नहीं माना है। डिवीजन बेंच ने कहा कि केवल पारिवारिक रिश्ता होने से मामला फैमिली कोर्ट के दायरे में नहीं आ जाता। विवाद का आधार सीधे वैवाहिक रिश्ते से जुड़ा होना चाहिए।
हाईकोर्ट ने रायपुर फैमिली कोर्ट के उस फैसले को सही माना, जिसमें ननद की ओर से प्रस्तुत किए गए लेनदेन के केस को रजिस्टर करने से इनकार कर दिया गया था।
मामले के अनुसार, रायपुर की रहने वाली रुचि पसारी ने अपनी भाभी राधिका गुप्ता के खिलाफ फैमिली कोर्ट में स्त्रीधन वापस करने के लिए आवेदन दिया था। उन्होंने बताया कि साल 2014 से 2016 के बीच अलग-अलग बैंक ट्रांजेक्शन के जरिए उन्होंने भाभी को कुल 47 लाख रुपए दिए थे। यह रकम उनकी खुद की कमाई और स्त्रीधन का हिस्सा थी। यह रकम उन्होंने भरोसे और कर्ज के रूप में दी थी।
आवेदन के मुताबिक, इसमें से भाभी ने 26 लाख 10 रुपए वापस कर दिए, लेकिन 20 लाख 99 हजार 990 रुपए वापस नहीं मिले। फैमिली कोर्ट के आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील में ननद ने बाकी रकम 12% ब्याज के साथ लौटाने की मांग की थी।
इसके अलावा कथित झूठी और परेशान करने वाली आपराधिक शिकायतों के कारण मानसिक परेशानी और प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचने का आरोप लगाते हुए 20 लाख रुपए मुआवजे की भी मांग की थी। लेकिन, फैमिली कोर्ट ने आवेदन को रजिस्टर करने से ही इनकार कर दिया। कहा था कि ननद और भाभी के बीच का विवाद किसी वैवाहिक रिश्ते की वजह से नहीं हुआ है, इसलिए फैमिली कोर्ट में यह मामला सुनवाई योग्य नहीं है। इसके खिलाफ रुचि ने हाई कोर्ट में अपील की।
हाईकोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट एक्ट की धारा 7(1) के तहत फैमिली कोर्ट को उन्हीं मामलों में अधिकार मिलता है, जिनका सीधा संबंध विवाह या वैवाहिक रिश्ते से हो। कानून में ‘वैवाहिक संबंध’ शब्द का इस्तेमाल पति-पत्नी के बीच कानूनी अधिकारों, दायित्वों और संबंधों के संदर्भ में किया गया है।
हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में दोनों पक्षों का रिश्ता ननद और भाभी का है। यह पारिवारिक रिश्ता जरूर है, लेकिन इस विवाद को धारा 7(1) के तहत ‘वैवाहिक रिश्ता’ नहीं माना जा सकता।



