नईदुनिया विशेष रिपोर्ट , बिलासपुर: ग्राम पंचायतों में विकास कार्यों के नाम पर सरकारी राशि के गबन और अनियमितताओं से जुड़े मामलों में बिलासपुर जिले की चार तहसीलों में कार्रवाई की धीमी रफ्तार पर सवाल उठ रहे हैं। मस्तूरी, बिल्हा, कोटा और तखतपुर में पूर्व सरपंचों और सचिवों से 3.14 करोड़ रुपये से अधिक की राशि की वसूली लंबित है। कई मामले वर्षों पुराने हैं, लेकिन पूरी राशि की वसूली अब तक नहीं हो सकी है।
जिम्मेदारों पर कार्रवाई के नाम पर कई मामलों में नोटिस, वसूली आदेश और राजस्व वसूली प्रमाणपत्र तक प्रक्रिया सीमित रह गई है। सवाल यह है कि जब पंचायत कानून में वसूली के लिए पर्याप्त अधिकार दिए गए हैं, तो उनका प्रभावी इस्तेमाल क्यों नहीं हो रहा।
छत्तीसगढ़ पंचायत राज अधिनियम की धारा 92 में पंचायत की राशि, अभिलेख या सामग्री अनधिकृत रूप से अपने पास रखने वाले व्यक्ति से उसे वापस लेने की व्यवस्था है। आदेश के बाद भी राशि या रिकॉर्ड वापस नहीं करने पर विहित प्राधिकारी उसे अधिकतम 30 दिन के सिविल जेल में भेज सकता है। राशि की वसूली भू-राजस्व के बकाए की तरह की जा सकती है, जबकि रिकॉर्ड या सामग्री के लिए तलाशी वारंट जारी करने का भी प्रावधान है। कार्रवाई शुरू होने के साथ संबंधित व्यक्ति छह साल तक पंचायत का सदस्य बनने के लिए अयोग्य हो जाता है। हालांकि कार्रवाई से पहले संबंधित व्यक्ति को अपना पक्ष रखने का उचित अवसर देना जरूरी है।
यानी कानून में वसूली और अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए केवल पत्राचार पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं है। हाल के एक सरकारी मामले में धारा 92 के तहत सिविल जेल की कार्रवाई भी की गई है, जिससे यह स्पष्ट है कि यह प्रावधान केवल कागज पर नहीं है।
मस्तूरी, बिल्हा, कोटा और तखतपुर में वर्षों से लंबित मामलों में प्रशासनिक पत्राचार और राजस्व वसूली की प्रक्रिया चलती रही है। कहीं संबंधित व्यक्ति की मृत्यु, कहीं राशि जमा नहीं करने और कहीं पुराने रिकॉर्ड के आधार पर कार्रवाई आगे नहीं बढ़ने की स्थिति सामने आती है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि करोड़ों रुपये की सरकारी राशि की वसूली कब पूरी होगी? धारा 92 में स्पष्ट अधिकार होने के बावजूद यदि वर्षों तक राशि नहीं लौटती, तो जिम्मेदारी केवल पूर्व सरपंच या सचिव की नहीं, बल्कि वसूली प्रक्रिया को प्रभावी ढंग से आगे बढ़ाने वाले तंत्र की भी जांच के दायरे में आनी चाहिए।
अधिवक्ता संतोष कुमार पांडेय, छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट
संतोष पांडेय के अनुसार पंचायतों में गबन की राशि की वसूली लंबे समय तक अटके रहने के पीछे स्थानीय प्रभाव और प्रशासनिक स्तर पर कार्रवाई की कमजोरी जैसे कारण हो सकते हैं। उनका कहना है कि कई मामलों में जिम्मेदार अधिकारियों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि जांच और सुनवाई पूरी होने के बाद उपलब्ध वैधानिक वसूली प्रक्रिया प्रभावी रूप से लागू हो।
उनके अनुसार, यदि जांच में आपराधिक कृत्य के पर्याप्त तथ्य सामने आते हैं तो केवल विभागीय वसूली तक सीमित रहने के बजाय संबंधित थाने में आपराधिक कार्रवाई के लिए दस्तावेज भेजे जाने चाहिए। अपराध की प्रकृति और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर भारतीय न्याय संहिता तथा भ्रष्टाचार निवारण कानून की लागू धाराओं पर भी विचार किया जा सकता है।
सरपंचों से वसूली के मामले में प्रकरण जपनद से भेजे गए हैं तो उनमें प्रत्येक प्रकरण की सुनवाई में संबंधित व्यक्तियों का पक्ष सुने बिना निर्णय नहीं लिया जा सकता। ऐसे प्रकरणों की सुनवाई कर नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी। संजय अग्रवाल, कलेक्टर बिलासपुर



