राज्य ब्यूरो, नईदुनिया. रायपुर। नदियों में शहरी नालों का दूषित पानी लगातार पहुंच रहा है, लेकिन इसे रोकने के लिए नालों और सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) का हिसाब देने में विभाग को नौ माह भी कम पड़ गए हैं। सात जनवरी 2026 को रिवर रिजुवेनेशन कमेटी ने महानदी, अरपा, खारून, केलो, शिवनाथ और हसदेव के प्रदूषित हिस्सों में मिलने वाले नालों और उनसे जुड़े एसटीपी की जानकारी मांगी थी। अब तक जानकारी नहीं मिलने पर नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग को सभी निकायों को दोबारा स्मरण पत्र जारी कर जानकारी तलब करनी पड़ी है।
सभी नगर निगम आयुक्तों और नगर पालिका परिषद व नगर पंचायतों के मुख्य नगर पालिका अधिकारियों से निर्धारित प्रारूप में जानकारी मांगी गई है। आवास एवं पर्यावरण विभाग के सचिव की अध्यक्षता में रिवर रिजुवेनेशन कमेटी की बैठक हुई थी, जिसमें नगरीय प्रशासन विभाग के प्रतिनिधि ने बताया था कि नदियों के प्रदूषित हिस्सों में दूषित जल उपचार संयंत्रों की संख्या 22 से नबढ़कर 24 हो गई है।
बिलासपुर के कोनी व दोमुहनी, गोबरा नवापारा, धमतरी, नवा रायपुर के सेक्टर दो, तीन, चार, किरोडीमल चरामा, कांकेर, शिमगा, चांपा में संयंत्रों की उपयोगिता कम है। सचिव ने इन संयंत्रों को पूरी क्षमता से संचालित करने कार्ययोजना बनाने के निर्देश दिए थे। उन्होंने महानदी, अरपा, खारून, केलो, शिवनाथ, हसदेव के प्रदूषित क्षेत्र में मिलने वाले शहरी नालों को सूचीबद्ध कर नालों में लगने वाले एसटीपी की जानकारी संकलित करने के निर्देश दिए थे।
यह भी सुनिश्चित करने कहा था कि एसटीपी प्रदूषित जल के ट्रीटमेंट के लिए पर्याप्त है या नहीं। यदि कुछ नालों पर एसटीपी की आवश्यकता हो तो ऐसे नदियों में मिलने वाले नालों की संख्या इत्यादि का जीआइएस मैप के साथ कार्ययोजना प्रस्तुत किया जाए। उन्होंने जिन नालों पर एसटीपी बन चुके हैं लेकिन उपयोगिता कम है, उन्हें पूरी क्षमता से चलाने की योजना भी मांगी थी।
नगरीय प्रशासन विभाग ने विगत माह नेशनल मिशन फार क्लीन गंगा (एनएमसीजी) की प्रगति रिपोर्ट पर्यावरण संरक्षण मंडल को भेजी थी। इसमें यह बात सामने आए थी कि प्रदेश में प्रतिदिन 743.51 एमएलडी सीवेज उत्पन्न हो रहा है। प्रदेश के 194 निकायों में 25 एसटीपी संचालित हैं। इनकी कुल क्षमता 458.3 एमएमडी है लेकिन वर्तमान में 306.25 एमएलडी क्षमता का ही उपयोग हो रहा है। 152.05 एमएलडी क्षमता खाली पड़ी है और एसटीपी की कुल क्षमता का करीब 33 प्रतिशत हिस्सा उपयोग में नहीं आ रहा है।



